𝓥𝓡𝓘𝓝𝓓𝓐𝓥𝓐𝓝 राधे राधे
वृन्दावन मथुरा के पास एक ऐसी नगरी जहाँ भगवान् श्री कृष्ण ने अपनी बाल लीलायें की एक ऐसा चमत्कारी नगर जहाँ की कहानियां सुनकर लोग आज भी मंत्रमुग्ध हो जाते है. कहते है की भगवान् श्री कृष्णा आज भी यहाँ विराजते है यहाँ एक बहुत पुराण मंदिर है श्री वृन्दावन बिहारी लाल का बड़े बड़े महात्मा कहते है की इन को मूर्ति मत समझना श्री बिहारी जी साक्षत यहाँ विराजते है.बहुत सारी कहानियां भी है.जिन से यह सिद्ध होता है की भगवान् आज भी यहाँ रहते है.
आज भी ब्रज में रहने वाले लोग भगवान् को लल्ला के नाम पुकारते है. ब्रज में आज भी भगवान् के बाल रूप की पूजा की जाती है हर घर में भगवान् की लड्डू गोपाल की मूर्ति की सेवा की जाती है. सेवा इस प्रकार है ;-
- सुबह लल्ला (लड्डू गोपाल जी ) को ताली बजा कर उठाना।
- पंचामृत से स्नान करना- माखन मिश्री का भोग लगाना
- घर की रसोई में जो भी बना है सबसे पहले अपने कन्हैया को देना।
- और शाम के खाने के बाद शयन आरती के साथ उन को सुलाना।
ये हर ब्रजवासी की दिनचर्या होती है. आज भी अपने बच्चे की तरह प्यार करते है ब्रजवासी अपने गोपाल को।
-कैसे प्रकट हुए श्री वृन्दावन बिहारी लाल ?
स्वामी हरिदास जी महाराज जो की महान संगीत सम्राट तानसेन के गुरु थे। श्री कृष्णा भगवान् के बहुत बड़े भक्त थे. उन्होंने अपनी संगीत कला को सिर्फ भगवान् के लिए ही अर्पण किया हुआ था वो प्रतिदिन श्री कृष्ण जी की रास लीला स्थली पर जा कर संगीत से भगवान् की आराधना किया करते थे।
जब भी हरिदास जी अपने संगीत से भगवान् की आराधना में खो जाते भगवान् खुद साक्षात् आ कर उन को दर्शन देते।
एक दिन हरिदास जी के एक शिष्य ने कहा की हे महाराज जी हम सभी श्री कृष्ण के दर्शन करना कहते है। उन से प्यार दुलार करना कहते है उन की सेवा करना कहते है। बस फिर क्या था हरिदास जी ने उस की भावनाओं को ध्यान में रख कर अपनी आराधना में खो गए और भजन गाने लगे।
जब श्री कृष्णा अपनी राधा रानी के साथ उन को दर्शन देने आये तो हरिदास जी ने अपने शिष्यो की भावना को जाहिर किया तो भगवान् ने कहा की हम दोनों इसी रूप में यहाँ रह जाते है। तब हरिदास जी ने कहा की हे कन्हैया में तो एक संत हूँ आप की तो सेवा कर लूंगा लेकिन राधा रानी जी के लिए रोज नए आभूषण और वस्त्र कहाँ से लाऊंगा। हरिदास जी की बात सुन कर भगवान् मुस्कराये और थोड़ी ही देर में राधा कृष्णा की युगल जोड़ी एक दूसरे में समां कर विग्रह रूप प्रकट हुई। राधा कृष्णा के इस रूप को हरिदास जी ने बांके बिहारी का नाम दिया। बांके बिहारी राधा कृष्णा का मिला हुआ रूप है। इन के दर्शन मात्र से सभी मनोकामएं पूरी हो जाती है। (बोलो राधे राधे श्याम से मिला दे )श्री राधा
एक बार श्री राधारानी जी ने "श्री सेवा कुञ्ज" में रास में आने में बहुत देर लगा दी तो,
श्यामसुंदर उनकी विरह में रोने लगे ! जब स्वामिनी को बहुत देर हो गयी तब श्यामसुंदर धीरता ना रख सके और सखीयो से पूछने लगे !
परंतु थोड़ी ही देर में स्वामिनी रासमंडल में पधारी ! तभी श्याम मान ठान कर बैठ गए...
तब स्वामिनी जी बोली !
ललिता जी इन महाराज को क्या हुआ,
जो मुँह फुलाय काहे बैठे है !
ललिता जी ने पूरी कथा सुना दी !
स्वामिनी जी मुस्कुराते हुए श्याम के चिबुक पर हाथ लगाया, जैसे ही लगाया
श्याम के चिबुक पर "दाल चावल" लग गए
श्याम और मान ठान बैठे !
बोले एक तो "देर से और अब हमारे मुख पर दाल भात्त" लगाय सखियों से मज़ाक़ करवाओगी !
स्वामिनी जी मुस्कुरा के बोली,
"ललिताजी एक बात बताओ"
"यह सब जो बाबा लोग है जो जितने भी भजनानंदी है, यह सब अपना घरबार छोड़ ब्रज रज में भजन करने आवे, इन्हें यहाँ लाने वाला कौन है"
ललिता जी बोले - यही आपके श्यामसुंदर !
तो ललिताजी क्या इनका "कर्तव्य नहीं बनता के जो इनके नाम का पान करने घर छोड़ भजन करने वृंदावन आए और इनके नाम कीर्तन करे तो इन्हें उनका ख़याल रखना चाहिये !
अब आज "इतनी घनघोर वर्षा हुई के वृंदावन के आज दस महात्मा कहीं मधुकरी करने ना जा सके"
तब वो सोचे "जैसे ठाकुरजी की इच्छा" बोले ख़ाली पेट सोने लगे
तभी मैं वहीं से गुज़र रही थी रासमंडल के लिए
मैंने तभी " जल्दी जल्दी उन दस महात्माओं के लिए दाल भात्त बनायी और अपने हाथो से परोस आयी और कहा " बाबा मोहे मेरी मैया ने भेजा है आप मधुकरी करने को ना गए ना
तभी मोहे देर हो गयी और जल्दी जल्दी में अपने हाथ ना धो सकी तो हाथ में दालभात्त लगा ही रह गया
यह सुन श्याम रोने लगे और चरण में पड़कर बोले
स्वामिनी " वैराग्य उत्पन्न करा घर बार छुड़ाना
यह मेरा काम हैं
परंतु
उन सब को प्रेम, दुलार, सम्मान उनकी रक्षा करना उन्हें अपनी गोद में लेकर "बार बार कहना कृपा होगी होगी होगी, मैं हूँ ना" यह सब तो आप ही करना जानती हो !
श्याम, सखियाँ, मंजरिया, लता, पुष्प, पशु, पक्षी, कण कण बोल उठा.....
"श्री राधा श्री राधा श्री राधा"
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